शराब पर निर्भरता एवं इससे मुक्ति के उपाय- - Kumar Surendra

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Wednesday, 18 July 2018

शराब पर निर्भरता एवं इससे मुक्ति के उपाय-


    शराब पर निर्भरता एवं इससे मुक्ति के उपाय-
मद्यपान आज की सामाजिक संस्कृति का भाग हो गया है परंतु सामाजिक तौर पर शराब पीने और शराबी हो जाने में अंतर है सामान्य व्यक्ति शराब की मात्रा को अपने नियंत्रण में रखता है जबकि शराबी शराब के नियंत्रण में हो जाता है| शराब के आदी व्यक्ति के लक्षण निम्न है-
·          व्यक्ति को प्रतिदिन एक निश्चित समय पर मद्यपान की प्रबल इच्छा होती है|


·          कुछ व्यक्ति हफ्तों तक मद्यपान नहीं करते परंतु जब शराब पीना प्रारम्भ करते हैं तो दिन-रात शराब पीते हैं|


·           व्यक्ति बार-बार शराब छोड़ना चाहकर भी इसे नहीं छोड़ पाता|

·          शराब छोड़ने का प्रयत्न करने पर व्यक्ति को कुछ तकलीफ होती हैं, जैसे- नींद ना आना, हाथ पांव में कंपन होना, उल्टी का अहसास होना, कभी-कभी मिर्गी का दौरा आना, अपने परिजनो को न पहचानना, उल्टी-सीधी बातें करना|

·          मद्यपान की आदत के कारण पारिवारिक, सामाजिक एवं आर्थिक क्षति होने के बावजूद मद्यपान बंद न कर पाना|

·           यदि व्यक्ति के मद्यपान की क्षमता कालान्तर में धीरे-धीरे बढ़ रही हो तो उसके शराबी होने की संभावना है|

    शराबी होने के कारण-


प्रत्येक व्यक्ति जो शराब पीता शराबी नहीं होता है|
·          कारीब 50 परिशत शराबियों को मानसिक बीमारियाँ जैसे- मोनिया, डिप्रेशन या सिशल फोबिया होती है जिसके कारण इनको शराब पीने की आदत हो जाती है|

·          अन्य 50 प्रतिशत शरबियों के स्नायु संरचना में ही ऐसी कमी होती है कि ये व्यक्ति बार-बार शराब खोजते हैं|


     मद्पान से होने वाली बीमारियाँ‌‌‌-

मद्पान से शारीरिक एवं मानसिक दोनो ही तरह की बीमारियाँ‌

      i.             शारीरिक बीमारियाँ-  
मद्पान से यकृत को क्षति पहुँचती है तथा इससे सिरोसिस नामक बीमारी हो जा सकती है| शराब दिल की क्षति पहुँचाकर कार्डियोमायोपैथी नामक बीमारी पैदा कर सकता है| इसी प्रकार अत्यधिक मद्यपान से हाथ-पाँव की नसों को क्षति पहुँचती है, जिसके कारण हाथ-पाँव में दर्द तथा टीस बना रहता है|                                                                                                                               
     ii.              मानसिक बीमारियाँ-
अल्कोहलिक हैलुसिनोसिअ नामक बीमारी में रोगी को तरह-तरह की भयानक आवाजें सुनाई देती है जो कि पूर्णतया काल्पनिक होती है| ये आवाजें रोगी को डराती धमकाती हैं|
एल्कोहलिक पैरानोइया नामक बीमारी में रोगी अपनी पत्नी के चरित्र पर शक करने लगता है इस शक के वशीभूत रोगी अपनी पत्नी को प्रताड़ित करता है तथा कभी-कभी हत्या भी कर देता है, कुछ व्यक्तियों का व्यवहार शराब पीने के बाद बिल्कुल ही बदल जाता है, ऐसे व्यक्ति शराब पीने के बाद बहुत ही हिंसक हो जाते हैं तथा तोड़फोड़ करने लगते हैं इस अवस्था को पैथोलॉजिकल इनटॉक्सिकेशन कहते हैं|
कोरसाकोफ साइकोसिस नामक बीमारी में शराबी की स्मरण शक्ति नष्ट हो जाती है और उसे कोई नई बात याद नहीं रहती है बीमारी की शुरुआत के बाद ऐसा व्यक्ति किसी भी नई घटना को लंबे समय तक याद नहीं रख सकता है|

    शराब की आदत कैसे छुड़ाएं-

         सर्वप्रथम परिजनों को यह समझना आवश्यक है कि शराब पर निर्भरता एक रोग है तथा यह सिर्फ रोगी की शैतानी नहीं है यदि रोगी स्वयं ही शराब छोड़ना चाहता है तो उपचार बहुत ही आसान हो जाता है परंतु आधुनिक औषधियों से शराब की आदत रोगी की इच्छा ना होने पर भी छुड़ाई जा सकती है
            ऐसे रोगियों को किसी भी प्रकार (साम दाम दंड या भेद से) मानसिक रोग विशेषज्ञ के पास लाना चाहिए मनोचिकित्सक सबसे पहले ऐसे रोगियों के शारीरिक स्वास्थ्य की परीक्षा कर मद्जनित शारीरिक रोगों का उपचार स्वयं करते हैं या अन्य विशेषज्ञ से कराते हैं इसके उपरांत रोगी का शराब पीना तुरंत ही बंद कर दिया जाता है इसके लिए कभी-कभी रोगी को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ सकता है अचानक शराब छुड़ाने पर रोगी को जो भी तकलीफ होती हैं उसे औषधियों द्वारा ठीक किया जाता है रोगी के स्वस्थ हो जाने के उपरांत यह निर्णय लिया जाता है कि
किस मानसिक रोग के कारण व्यक्ति शराब पी रहा है तथा आवश्यकतानुसार उसकी चिकित्सा की जाती है

        कुछ रोगियों को नालट्रेक्शान एवं फ्लूआक्सेटिन नामक औषधियों से शराब पीने की इच्छा में कमी आती है| आईसल्फिराम के नियमित सेवन रोगी की शराब पचाने की क्षमता कम हो जाती है, तथा शराब पीते ही रोगी को सिरदर्द, घबराहट, चक्कर एवं उल्टी होने लगती है जिससे डरकर रोगी शराब पीना छोड़ देता है परंतु इन औषधियों को लगातार कम से कम 2 वर्ष तक खिलाते रहने की जिम्मेदारी मूलतः परिजनों की होती है|

    ब्राउन शुगर इसमें की आदत एवं इसका निवारण-

          ब्राउन शुगर वास्तव में अफीम का एक कृत्रिम रूप है जिसे हेरोईन भी कहते हैं हेरोईन का सेवन इसे जलाकर उसके लिए को कागज की पतली पाइप द्वारा सांस के माध्यम से लेकर किया जाता है कुछ व्यक्ति से इंजेक्शन के माध्यम से भी लेते हैं ब्राउन शुगर की आदत इसके 1 सप्ताह तक नियमित सेवन करने से ही पड़ जाती है|
पेथीडिन, माफिन, फोर्ट्विन, टिडिजेसिक, प्राक्सिवान, कोडिन तथा कोडिन मिश्रित कुछ कफ सीरप भी हेरोईन से ही सम्बंधित हैं, परन्तु इनकी तुलना में हेरोईन कई गुना ज्यादा नशीला होता है|
जिन नवयुवकों को इस पदार्थ की आदत पड़ जाती है वह अक्सर घर से असमय बाहर निकलते हैं स्कूल से ऐसे छात्र अक्सर अनुपस्थिति रहते हैं ऐसे युवक कई बार घर से पैसा चुरा कर या सामान चुरा कर अपने व्यसन की संतुष्टि करते हैं ऐसे व्यक्ति को यदि बलपूर्वक नशीले पदार्थ से करीब 12 घंटे के लिए दूर रखा जाए तो इनमे निम्नलिखित लक्षण मिलते हैं-

·          आंख और नाक से पानी आना|
·          पेट में दर्द बार-बार पतला पैखाना होना|
·           अत्यधिक बेचैनियों अनिद्रा|
 कभी-कभी इस अवस्था में नशीले पदार्थ को प्राप्त करने के लिए रोगी हिंसक भी हो जाता है|

    ब्राउन शुगर की आदत कैसे छुड़ाएं-


 ऐसे व्यक्ति को प्रेरित करके या फिर बलपूर्वक मानसिक रोग चिकित्सक को दिखलाना चाहिए आवश्यकतानुसार ऐसे रोगी को अस्पताल में भी भर्ती कराना पड़ सकता है चिकित्सा के प्रथम चरण में रोगी को ऐसी औषधियां दी जाती हैं जो रोगी के बेचैनी तथा अनिद्रा को दूर करती है रोगी को नशे से पूर्णतया मुक्त कराने के लिए करीब 2 सप्ताह तक चिकित्सक की जाती है तत्पश्चात उपचार का दूसरा चरण प्रारंभ होता है इस चरण में नालट्रेक्शान नामक औषधि दी जाती है जिसका असर शरीर पर करीब 72 घंटो तक रहता है इस अवधि में यदि व्यक्ति भूलवश हेरोईन का सेवन कर भी लेता है तो उसे नशा नहीं होता है इस औषधि को लगातार 2 वर्षों तक रोगी को खिलाने की जिम्मेदारी मूलतः परिजन की ही होती है इस औषधि के लगातार सेवन से रोगी धीरे-धीरे बिल्कुल स्वस्थ हो जाता है|





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